भगवान विष्णु के परमपद द्वारा सृष्टि की उत्पत्ति बताते हुये कहा गया कि भगवान विष्णु ने ब्रहमरूप से सृष्टि की उत्पत्ति की विष्णुरूप में उसका पालन किया और रूद्ररूप में सृष्टि का संहार किया
विष्णु पुराण में इन भगवान विष्णु को विकार रहित शुद्व अविनाशी और सदा एकरस रहने वाला कहा है ये पर से भी परे हैं अर्थात सृष्टि के रहने या नहीं रहने के बावजूद सदैव विद्यमान रहते हैं विष्णु पुराण के अनुसार वे सर्वत्र विद्यमान हैं और समस्त सृष्टि उनमें व्याप्त है
पुरूष प्रकृति व्यक्त और काल ये भगवान विष्णु के चार परमरूप हैं और ये चारों ही सृष्टि की उत्पत्ति स्थिति और संहार के कारण हैं इनमें प्रकृति को क्षयरहित आधार रहित अप्रमेय अजर अमर निश्चल शब्द स्पर्शादि शून्य और रूपादिरहित कहा गया यह त्रिगुणमयी और सृष्टि का कारण है परंतु स्वयं अनादि उत्पत्ति और लय से रहित है प्रलयकाल से लेकर सृष्टि के आदि तक समस्त प्रपंच इसी में व्याप्त रहता है सृष्टि की उत्पत्ति के समय प्रकृति और पुरूष संयुक्त होते हैं और जब ये एक दूसरे से वियुक्त होते हैं तो प्रलयकाल होता है भगवान विष्णु के जिस रूप अथवा आयाम में प्रकृति और पुरूष के संयुक्त और वियुक्त होने की जो प्रक्रिया संपन्न होती है वो रूपान्तर ही भगवान विष्णु का कालरूप है काल अनादि और अनंत है और इसी लिये सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय का क्रम जारी रहता है
विष्णु पुराण में कहा गया कि प्रलयकाल में ना दिन था ना ही रात ना पृथिवी थी ना ही आकाश ना अन्धकार था और ना ही प्रकाश बस श्रोत्रादि इन्द्रियों और बुद्वि आदि का अविषय एक प्रधान ब्रहम और पुरूष ही था कहा गया कि प्रलयकाल में प्रकृति के साम्यावस्था में आ जाने पर और पुरूष के उससे वियुक्त हो जाने पर भगवान विष्णु का कालरूप् इन्हें पुनः धारण करने के लिये प्रवृत होता है आगे कहा गया कि सर्गकाल में भगवान विष्णु अपनी इच्छा से विकारी प्रकृति और अविकारी पुरूष में प्रविष्ट होकर उन्हें क्षोभित करते हैं वे अपने सन्निधि मात्र से ही प्रकृति और पुरूष को प्रेरित करते हैं यहां ये भी कहा गया कि वे ही क्षोभित करते हैं और वे ही क्षुब्ध होते हैं तथा प्रकृति की साम्यावथा और क्षोभित अवस्था में भी वे स्वयं ही विद्यमान होते हैं
आगे कहा गया कि सर्गकाल में साम्यावस्था में रही प्रकृति भगवान विष्णु के क्षेत्रज्ञरूप् से अधिष्ठित होकर महत्तत्व को जन्म देती है प्रकृति से आवृत्त होकर ये तीन प्रकार सात्विक राजस और तामस का हुआ ये त्रिविध महत्तत्व प्रकृति से ही सर्वत्र व्याप्त है त्रिविध महत्ततव से त्रिविध अर्थात वैकारिक तैजस और तामस ये तीन प्रकार का अहंकार उत्पन्न हुआ त्रिगुणात्मक होने के कारण ये भूत और इन्द्रियों का कारण है जिस प्रकार प्रकृति से महत्तत्व व्याप्त है उसी प्रकार महत्तत्व से ये अहंकार व्याप्त है
तामस अहंकार ने विकृत होकर शब्द तन्मात्रा और उससे शब्द गुणवाले आकाश की रचना की ये शब्द गुणवाला आकाश शब्द तन्मात्रा से आवृत हुआ और जिससे विकृत होकर आकाश ने स्पर्श तन्मात्रा को रचा
इससे वायु उत्पन्न हुआ और इसका गुण स्पर्श कहा गया शब्द तन्मात्रा रूपी आकाश ने स्पर्श तन्मात्रा रूपी वायु को आवृत किया जिससे रूप तन्मात्रा की उत्पत्ति हुई रूप तन्मात्रायुक्त वायु से तेज उत्पन्न हुआ जिसका गुण रूप कहा गया स्पर्श तन्मात्रा रूप वायु ने रूप तन्मात्रा युक्त तेज को आवृत किया जिससे विकृत हुये तेज ने रस तन्मात्रा को रचा उस रस तन्मात्रारूप से रस गुण वाला जल उत्पन्न हुआ रस तन्मात्रा वाले जल को रूप तन्मात्रा वाले तेज ने आवृत किया तब जल ने विकृत होकर गंध तन्मात्रा को रचा जिससे पृथिवी की उ त्पत्ति हुई जिसका गुण गंध माना गया
उपरोक्त वर्णन में ये स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार तामस अहंकार से पंच महाभूतों की उत्पत्ति हुई इन महाभूतों में केवल तन्मात्रायें ही हैं अर्थात ये गुणरूप हैं इनमें कोई विशेष भाव नहीं है इसलिये इनकी अविशेष संज्ञा है ये अविशेष तन्मात्रायें सुख दुख अथवा मोहरूप से अनुभव नहीं की जा सकती इस प्रकार तामस अहंकार से भूत तन्मात्रारूप सर्ग अस्तित्व में आया
इन भूतों में प्रथक प्रथक नाना प्रकार की शक्तियां हैं परंतु परस्पर पूर्णतया एक दूसरे से मिले बिना ये सृष्टि की रचना नहीं कर सकते इसलिये एक दूसरे से आश्रित और एक ही संघात की उत्पत्ति के लक्ष्य वाले महत्तत्व से लेकर विशंषपर्यंत प्रकृति के इन सभी विकारों ने पुरूष से अधिष्ठित होकर परस्पर मिलकर सर्वथा एक होकर प्रकृति के अनुग्रह से एक अण्ड की उत्पत्ति की जल के बुलबुले के समान क्रमशः भूतों से बडा हुआ वह गोलाकार और जल पर स्थित महान अण्ड ब्रहमरूप विष्णु का अति उत्तम प्राकृत आधार हुआ उसमें वे अव्यक्त स्वरूप जगत्पति विष्णु व्यक्त हिरण्यगर्भ रूप से स्वयं ही विराजमान हुये उन महात्मा हिरण्यगर्भ का सुमेरू उल्ब अन्य पर्वत जरायु तथा समुद्र गर्भाशयस्य रस था इसी अण्ड में समस्त सृष्टि का प्रादुंर्भाव हुआ
ये अण्ड तामस अहंकार से आवृत है तथा भूतादि महत्तत्व से घिरा है इन सबके सहित वह महत्तत्व भी अव्यक्त प्रधान से आवृत है कुल मिलाकर ये अण्ड सात प्राकृत आवरणों से घिरा है इसमें स्थित हुये स्वयं भगवान विष्णु रजोगुण का आश्रय लेकर सृष्टि की रचना में प्रवृत होते हैं रचना हो जाने पर सत्वरूपी विष्णुरूप मे कल्पान्तपर्यंन्त उसका पालन करते हैं फिर कल्प का अत होने पर तम प्रदान रूद्ररूप धारण कर समस्त भूतों का भक्षण कर लेते हैं इस प्रकार भूतों का भक्षण कर सृष्टि को जलमय कर वे शेष शयया पर शयन करते हैं जागने पर वे पुनः ब्रहमारूप् में सृष्टि की रचना में प्रवृत हो जाते हैं इस प्रकार उत्पत्ति और प्रलय का ये क्रम जारी रहता है लगातार पेज 3
विष्णु पुराण में इन भगवान विष्णु को विकार रहित शुद्व अविनाशी और सदा एकरस रहने वाला कहा है ये पर से भी परे हैं अर्थात सृष्टि के रहने या नहीं रहने के बावजूद सदैव विद्यमान रहते हैं विष्णु पुराण के अनुसार वे सर्वत्र विद्यमान हैं और समस्त सृष्टि उनमें व्याप्त है
पुरूष प्रकृति व्यक्त और काल ये भगवान विष्णु के चार परमरूप हैं और ये चारों ही सृष्टि की उत्पत्ति स्थिति और संहार के कारण हैं इनमें प्रकृति को क्षयरहित आधार रहित अप्रमेय अजर अमर निश्चल शब्द स्पर्शादि शून्य और रूपादिरहित कहा गया यह त्रिगुणमयी और सृष्टि का कारण है परंतु स्वयं अनादि उत्पत्ति और लय से रहित है प्रलयकाल से लेकर सृष्टि के आदि तक समस्त प्रपंच इसी में व्याप्त रहता है सृष्टि की उत्पत्ति के समय प्रकृति और पुरूष संयुक्त होते हैं और जब ये एक दूसरे से वियुक्त होते हैं तो प्रलयकाल होता है भगवान विष्णु के जिस रूप अथवा आयाम में प्रकृति और पुरूष के संयुक्त और वियुक्त होने की जो प्रक्रिया संपन्न होती है वो रूपान्तर ही भगवान विष्णु का कालरूप है काल अनादि और अनंत है और इसी लिये सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय का क्रम जारी रहता है
विष्णु पुराण में कहा गया कि प्रलयकाल में ना दिन था ना ही रात ना पृथिवी थी ना ही आकाश ना अन्धकार था और ना ही प्रकाश बस श्रोत्रादि इन्द्रियों और बुद्वि आदि का अविषय एक प्रधान ब्रहम और पुरूष ही था कहा गया कि प्रलयकाल में प्रकृति के साम्यावस्था में आ जाने पर और पुरूष के उससे वियुक्त हो जाने पर भगवान विष्णु का कालरूप् इन्हें पुनः धारण करने के लिये प्रवृत होता है आगे कहा गया कि सर्गकाल में भगवान विष्णु अपनी इच्छा से विकारी प्रकृति और अविकारी पुरूष में प्रविष्ट होकर उन्हें क्षोभित करते हैं वे अपने सन्निधि मात्र से ही प्रकृति और पुरूष को प्रेरित करते हैं यहां ये भी कहा गया कि वे ही क्षोभित करते हैं और वे ही क्षुब्ध होते हैं तथा प्रकृति की साम्यावथा और क्षोभित अवस्था में भी वे स्वयं ही विद्यमान होते हैं
आगे कहा गया कि सर्गकाल में साम्यावस्था में रही प्रकृति भगवान विष्णु के क्षेत्रज्ञरूप् से अधिष्ठित होकर महत्तत्व को जन्म देती है प्रकृति से आवृत्त होकर ये तीन प्रकार सात्विक राजस और तामस का हुआ ये त्रिविध महत्तत्व प्रकृति से ही सर्वत्र व्याप्त है त्रिविध महत्ततव से त्रिविध अर्थात वैकारिक तैजस और तामस ये तीन प्रकार का अहंकार उत्पन्न हुआ त्रिगुणात्मक होने के कारण ये भूत और इन्द्रियों का कारण है जिस प्रकार प्रकृति से महत्तत्व व्याप्त है उसी प्रकार महत्तत्व से ये अहंकार व्याप्त है
तामस अहंकार ने विकृत होकर शब्द तन्मात्रा और उससे शब्द गुणवाले आकाश की रचना की ये शब्द गुणवाला आकाश शब्द तन्मात्रा से आवृत हुआ और जिससे विकृत होकर आकाश ने स्पर्श तन्मात्रा को रचा
इससे वायु उत्पन्न हुआ और इसका गुण स्पर्श कहा गया शब्द तन्मात्रा रूपी आकाश ने स्पर्श तन्मात्रा रूपी वायु को आवृत किया जिससे रूप तन्मात्रा की उत्पत्ति हुई रूप तन्मात्रायुक्त वायु से तेज उत्पन्न हुआ जिसका गुण रूप कहा गया स्पर्श तन्मात्रा रूप वायु ने रूप तन्मात्रा युक्त तेज को आवृत किया जिससे विकृत हुये तेज ने रस तन्मात्रा को रचा उस रस तन्मात्रारूप से रस गुण वाला जल उत्पन्न हुआ रस तन्मात्रा वाले जल को रूप तन्मात्रा वाले तेज ने आवृत किया तब जल ने विकृत होकर गंध तन्मात्रा को रचा जिससे पृथिवी की उ त्पत्ति हुई जिसका गुण गंध माना गया
उपरोक्त वर्णन में ये स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार तामस अहंकार से पंच महाभूतों की उत्पत्ति हुई इन महाभूतों में केवल तन्मात्रायें ही हैं अर्थात ये गुणरूप हैं इनमें कोई विशेष भाव नहीं है इसलिये इनकी अविशेष संज्ञा है ये अविशेष तन्मात्रायें सुख दुख अथवा मोहरूप से अनुभव नहीं की जा सकती इस प्रकार तामस अहंकार से भूत तन्मात्रारूप सर्ग अस्तित्व में आया
इन भूतों में प्रथक प्रथक नाना प्रकार की शक्तियां हैं परंतु परस्पर पूर्णतया एक दूसरे से मिले बिना ये सृष्टि की रचना नहीं कर सकते इसलिये एक दूसरे से आश्रित और एक ही संघात की उत्पत्ति के लक्ष्य वाले महत्तत्व से लेकर विशंषपर्यंत प्रकृति के इन सभी विकारों ने पुरूष से अधिष्ठित होकर परस्पर मिलकर सर्वथा एक होकर प्रकृति के अनुग्रह से एक अण्ड की उत्पत्ति की जल के बुलबुले के समान क्रमशः भूतों से बडा हुआ वह गोलाकार और जल पर स्थित महान अण्ड ब्रहमरूप विष्णु का अति उत्तम प्राकृत आधार हुआ उसमें वे अव्यक्त स्वरूप जगत्पति विष्णु व्यक्त हिरण्यगर्भ रूप से स्वयं ही विराजमान हुये उन महात्मा हिरण्यगर्भ का सुमेरू उल्ब अन्य पर्वत जरायु तथा समुद्र गर्भाशयस्य रस था इसी अण्ड में समस्त सृष्टि का प्रादुंर्भाव हुआ
ये अण्ड तामस अहंकार से आवृत है तथा भूतादि महत्तत्व से घिरा है इन सबके सहित वह महत्तत्व भी अव्यक्त प्रधान से आवृत है कुल मिलाकर ये अण्ड सात प्राकृत आवरणों से घिरा है इसमें स्थित हुये स्वयं भगवान विष्णु रजोगुण का आश्रय लेकर सृष्टि की रचना में प्रवृत होते हैं रचना हो जाने पर सत्वरूपी विष्णुरूप मे कल्पान्तपर्यंन्त उसका पालन करते हैं फिर कल्प का अत होने पर तम प्रदान रूद्ररूप धारण कर समस्त भूतों का भक्षण कर लेते हैं इस प्रकार भूतों का भक्षण कर सृष्टि को जलमय कर वे शेष शयया पर शयन करते हैं जागने पर वे पुनः ब्रहमारूप् में सृष्टि की रचना में प्रवृत हो जाते हैं इस प्रकार उत्पत्ति और प्रलय का ये क्रम जारी रहता है लगातार पेज 3