गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

सृष्टि का स्वरूप और आयु

      
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार वर्तमान वाराह कल्प में भगवान विष्णु के द्वारा वाराह रूप में जलमग्न पृथ्वी को निकालकर उसका उद्वार किया है ; उन्होंने पृथ्वी को निकालने के बाद उस पर तमाम रचनाओं को उसी प्रकार रच दिया जिस प्रकार वे पहले थी ; यहां एक विशेष बात ये कही गई है कि सृष्टि की रचना में भगवान केवल निमित्त मात्र हैं प्रधान कारण सृज्य पदार्थों की अपनी शक्तियां हैं ; वस्तुओं की रचना में केवल निमित्त की ही आवश्यकता होती है क्योंकि वे तो अपने परिमाण से ही स्थूल रूप प्राप्त कर लेती हैं ;
   ब्रह्मा द्वारा सृष्टि के सृजन के समय उन्होंने पहले पूर्ववत सृष्टि का चिंतन किया जिससे सर्वप्रथम तमोगुणी सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ ;इसमें तम, महाभोग,मोह ,तामिस्त्र और अंधतामिस्त्र ये पांच प्रकार की अविद्या उत्पन्न हुई ;दुबारा ध्यान करने पर ज्ञानशून्य ,बाहर भीतर से तमोमयी,,जड नगादि पांच प्रकार का सर्ग हुआ जिसे चौथा एवं मुख्य सर्ग कहा गया ; इस प्रकार आगे अज्ञानी विवेक रहित ,अनुचित मार्ग धारण करने वाला ,विपरीत ज्ञान को ही यथार्त मानने वाले और तिरछा चलने वाले तिर्यक सर्ग की उत्पत्ति हुई ; ये पांचवा सर्ग था ;  छठा सर्ग उर्ध्व स्त्रोत अर्थात देवसर्ग हुआ ,ये विषय सुख के प्रेमी ,आंतरिक और बाह्य ज्ञान से पूर्ण थे ; सातवां सर्ग अर्वाक स्त्रोत हुआ , ये सत रज और तम तीनों गुणों को समाहित किये हुये थे ; महत्तत्व को पहला सर्ग ,तन्मात्राओं काू दूसरा सर्ग और तीसरा सर्ग वैकारिक कहा गया है ; आठवां सर्ग अनुग्रहसर्ग है ; प्रथम तीन सर्ग प्राकृत और बाद के पांच वैकारी सर्ग हैं ; एक और नवें सर्ग को कौमार सर्ग कहा गया जो प्राकृत भी है और वैकारी भी ;
   सृष्टि की आयु के बारे में कहा गया है कि भगवान विष्णु के काल स्वरूप से इसकी गणना की जाती है ; देवताओं के बारह हजार वर्षों के सतयुग ,त्रेता ,द्वापर और कलियुग ये चार युग होते हैं ; इनका परिमाण क्रमशः 4,3,2 और 1हजार दिव्य वर्ष का होता है ; प्रत्येक युग से पहले उतने ही सौ वर्षों की संध्या और उसके बाद उतने ही सौ वर्षों के संध्यांश होते हैं ; चारों युगों का एक चतुर्युग और ऐसे 1 हजार चतुर्युग का ब्रह्मा का एक दिन होता है ; ब्रह्मा के एक दिन में 14 मनु अथवा मन्वन्तर होते हैं ; इस प्रकार 71 चतुर्युग और 5103 दिव्य वर्ष का एक मन्वन्तर होता है ; ये मनु अथवा देवताओं का काल है ; मानवी गणना से एक मन्वन्तर में 30 करोड 67 लाख 20 हजार वर्ष होते हैं ; इसका 14 गुना अर्थात 4 अरब 29 करोड 40 लाख 80 हजार वर्ष ब्रह्मा के एक दिन का मान है ; और यही इस सृष्टि की आयु है ;  इसके अनन्तर बाह्य नैमिक्तिक नामक प्रलय होता है ;प्रलय के बाद इतने ही परिमाण वाली रात्रि होती है ; जिसके बाद ब्रह्मा पुनः सृष्टि की रचना में प्रवृत होते है ; अर्थात ब्रह्मा के एक ही दिन में सृष्टि की रचना और प्रलय हो जाता है ; इस प्रकार ब्रह्मा का भी 1 वर्ष और फिर 100 वर्ष पूरे होते हैं जो कि उनकी परमायु है ;

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति

                  भगवान विष्णु के परमपद द्वारा सृष्टि की उत्पत्ति बताते हुये कहा गया कि भगवान विष्णु ने ब्रहमरूप से सृष्टि की उत्पत्ति की विष्णुरूप में उसका पालन किया और रूद्ररूप में सृष्टि का संहार किया
विष्णु पुराण में इन भगवान विष्णु को विकार रहित शुद्व अविनाशी और सदा एकरस रहने वाला कहा है ये  पर से भी परे हैं अर्थात सृष्टि के रहने या नहीं रहने के बावजूद सदैव विद्यमान रहते हैं विष्णु पुराण के अनुसार वे सर्वत्र विद्यमान हैं और समस्त सृष्टि उनमें व्याप्त है
  पुरूष प्रकृति व्यक्त और काल ये भगवान विष्णु के चार परमरूप हैं और ये चारों ही सृष्टि की उत्पत्ति स्थिति और संहार के कारण हैं इनमें प्रकृति को क्षयरहित आधार रहित अप्रमेय अजर अमर निश्चल शब्द स्पर्शादि शून्य और रूपादिरहित कहा गया यह त्रिगुणमयी और सृष्टि का कारण है परंतु स्वयं अनादि उत्पत्ति और लय से रहित है प्रलयकाल से लेकर सृष्टि के आदि तक समस्त प्रपंच इसी में व्याप्त रहता है सृष्टि की उत्पत्ति के समय प्रकृति और पुरूष संयुक्त होते हैं और जब ये एक दूसरे से वियुक्त होते हैं तो प्रलयकाल होता है भगवान विष्णु के जिस रूप अथवा आयाम में प्रकृति और पुरूष के संयुक्त और वियुक्त होने की जो प्रक्रिया संपन्न होती है वो रूपान्तर ही भगवान विष्णु का  कालरूप है काल अनादि और अनंत है और इसी लिये सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय का क्रम जारी रहता है
  विष्णु पुराण में कहा गया कि प्रलयकाल में ना दिन था ना ही रात ना पृथिवी थी ना ही आकाश ना अन्धकार था और ना ही प्रकाश बस श्रोत्रादि इन्द्रियों और बुद्वि आदि का अविषय एक प्रधान ब्रहम और पुरूष ही था कहा गया कि प्रलयकाल में प्रकृति के साम्यावस्था में आ जाने पर और पुरूष के उससे वियुक्त हो जाने पर भगवान विष्णु का कालरूप् इन्हें पुनः धारण करने के लिये प्रवृत होता है आगे कहा गया कि सर्गकाल में भगवान विष्णु अपनी इच्छा से विकारी प्रकृति और अविकारी पुरूष में प्रविष्ट होकर उन्हें क्षोभित करते हैं वे अपने सन्निधि मात्र से ही प्रकृति और पुरूष को प्रेरित करते हैं यहां ये भी कहा गया कि वे ही क्षोभित करते हैं और वे ही क्षुब्ध होते हैं तथा प्रकृति की साम्यावथा और क्षोभित अवस्था में भी वे स्वयं ही विद्यमान होते हैं
   आगे कहा गया कि सर्गकाल में साम्यावस्था में रही प्रकृति भगवान विष्णु के क्षेत्रज्ञरूप् से अधिष्ठित होकर महत्तत्व को जन्म देती है प्रकृति से आवृत्त होकर ये तीन प्रकार सात्विक राजस और तामस का हुआ ये त्रिविध महत्तत्व प्रकृति से ही सर्वत्र व्याप्त है त्रिविध महत्ततव से त्रिविध अर्थात वैकारिक तैजस और तामस ये तीन प्रकार का अहंकार उत्पन्न हुआ त्रिगुणात्मक होने के कारण ये भूत और इन्द्रियों का कारण है जिस प्रकार प्रकृति से महत्तत्व व्याप्त है उसी प्रकार महत्तत्व से ये अहंकार व्याप्त है
तामस अहंकार ने विकृत होकर शब्द तन्मात्रा और उससे शब्द गुणवाले आकाश की रचना की ये शब्द गुणवाला आकाश शब्द तन्मात्रा से आवृत हुआ और जिससे विकृत होकर आकाश ने स्पर्श तन्मात्रा को रचा
इससे वायु उत्पन्न हुआ और इसका गुण स्पर्श कहा गया शब्द तन्मात्रा रूपी आकाश ने स्पर्श तन्मात्रा रूपी वायु को आवृत किया जिससे रूप तन्मात्रा की उत्पत्ति हुई रूप तन्मात्रायुक्त वायु से तेज उत्पन्न हुआ जिसका गुण रूप कहा गया स्पर्श तन्मात्रा रूप वायु ने रूप तन्मात्रा युक्त तेज को आवृत किया जिससे विकृत हुये तेज ने रस तन्मात्रा को रचा उस रस तन्मात्रारूप से रस गुण वाला जल उत्पन्न हुआ रस तन्मात्रा वाले जल को रूप तन्मात्रा वाले तेज ने आवृत किया तब जल ने विकृत होकर गंध तन्मात्रा को रचा जिससे पृथिवी की उ त्पत्ति हुई जिसका गुण गंध माना गया
 उपरोक्त वर्णन में ये स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार तामस अहंकार से पंच महाभूतों की उत्पत्ति हुई इन महाभूतों में केवल तन्मात्रायें ही हैं अर्थात ये गुणरूप हैं इनमें कोई विशेष भाव नहीं है इसलिये इनकी अविशेष संज्ञा है ये अविशेष तन्मात्रायें सुख दुख अथवा मोहरूप से अनुभव नहीं की जा सकती इस प्रकार तामस अहंकार से भूत तन्मात्रारूप सर्ग अस्तित्व में आया
  इन भूतों में प्रथक प्रथक नाना प्रकार की शक्तियां हैं परंतु परस्पर पूर्णतया एक दूसरे से मिले बिना ये सृष्टि की रचना नहीं कर सकते इसलिये एक दूसरे से आश्रित और एक ही संघात की उत्पत्ति के लक्ष्य वाले महत्तत्व से लेकर विशंषपर्यंत प्रकृति के इन सभी विकारों ने पुरूष से अधिष्ठित होकर परस्पर मिलकर सर्वथा एक होकर प्रकृति के अनुग्रह से एक अण्ड की उत्पत्ति की जल के बुलबुले के समान क्रमशः भूतों से बडा हुआ वह गोलाकार और जल पर स्थित महान अण्ड ब्रहमरूप विष्णु का अति उत्तम प्राकृत आधार हुआ उसमें वे अव्यक्त स्वरूप जगत्पति विष्णु व्यक्त हिरण्यगर्भ रूप से स्वयं ही विराजमान हुये उन महात्मा हिरण्यगर्भ का सुमेरू उल्ब अन्य पर्वत जरायु तथा समुद्र गर्भाशयस्य रस था इसी अण्ड में समस्त सृष्टि  का प्रादुंर्भाव हुआ
 ये अण्ड तामस अहंकार से आवृत है तथा भूतादि महत्तत्व से घिरा है इन सबके सहित वह महत्तत्व भी अव्यक्त प्रधान से आवृत है कुल मिलाकर ये अण्ड  सात प्राकृत आवरणों से घिरा है इसमें स्थित हुये स्वयं भगवान विष्णु रजोगुण का आश्रय लेकर सृष्टि की रचना में प्रवृत होते हैं रचना हो जाने पर सत्वरूपी विष्णुरूप मे कल्पान्तपर्यंन्त उसका पालन करते हैं फिर कल्प का अत होने पर तम प्रदान रूद्ररूप धारण कर  समस्त भूतों का भक्षण कर लेते हैं  इस प्रकार भूतों का भक्षण कर सृष्टि को जलमय कर वे शेष शयया पर शयन करते हैं जागने पर वे पुनः ब्रहमारूप् में सृष्टि की रचना में प्रवृत हो जाते हैं इस प्रकार उत्पत्ति और प्रलय का ये क्रम जारी रहता है                                                                                                         लगातार पेज 3

मिस्टरी आफ ऑरिजन आफ दी यूनिवर्स पार्ट 1

   सृष्टि की उत्पत्ति किस प्रकार से हुई ये प्रश्न आदिकाल से ही मानव के लिये अनुउत्तरणीय रहा है़ भारतीय ऋषियों और मनीषियों ने अपने शोध अथवा यूं कहिये कि अपनी तपस्या के द्वारा सृष्टि की  उत्पत्ति के बारे में बहुत कुछ जाना और इसका वर्णन भारतीय धर्मग्रन्थों में किया
इन धर्मग्रन्थों के सामान्य अध्ययन से सृष्टि क्रम का पता लगा पाना संभव नहीं है क्योंकि इनमें सांकेतिक उदाहरणों के माध्यम से सृष्टि के रहस्यों पर से परदा उठाया गया है लिहाजा ये जरूरी है कि इनमें नीहित संकेतों को डिकोड किया जाये  ऐसा ही एक ग्रन्थ विष्णु पुराण है जिसमें इन रहस्यों का विशद वर्णन किया गया है हिन्दू धर्म ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य धर्मग्रन्थों में भी किसी ना किसी रूप में इस विषय पर प्रकाश डाला गया है
दूसरी और विज्ञान द्वारा भी कई दशकों से विभिन्न प्रयोगों के द्वारा सृष्टि की उत्पत्ति के रहस्य पर से परदा हटाने का प्रयास किया जाता रहा है बिगबैंग प्रयोग विज्ञान का इस दिशा में सबसे चर्चित प्रयोग रहा है
 प्रस्तुत ब्लोग में धार्मिक मान्यताओं और विज्ञान की कसौटियों पर कसते हुये इस रहस्य पर से परदा उठाने का प्रयास मेरे द्वारा किया जायेगा मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं ना तो कोई वैज्ञानिक हूं और ना ही कोई धर्मगुरू आपके जैसा एक सामान्य ईन्सान हूं जिसके मन में ऐसे विषयों को लेकर जिज्ञासा उठती रही फिर किसी प्रेरणा के तहत ही मेंने इस दिशा में चिंतन और मनन शुरू किया
किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले हम धार्मिक और वैज्ञानिक मान्यताओं का  अध्ययन करेंगे जो आवश्यक भी है                                                                                                                   लगातार पेज 2