हिन्दू मान्यताओं के अनुसार वर्तमान वाराह कल्प में भगवान विष्णु के द्वारा वाराह रूप में जलमग्न पृथ्वी को निकालकर उसका उद्वार किया है ; उन्होंने पृथ्वी को निकालने के बाद उस पर तमाम रचनाओं को उसी प्रकार रच दिया जिस प्रकार वे पहले थी ; यहां एक विशेष बात ये कही गई है कि सृष्टि की रचना में भगवान केवल निमित्त मात्र हैं प्रधान कारण सृज्य पदार्थों की अपनी शक्तियां हैं ; वस्तुओं की रचना में केवल निमित्त की ही आवश्यकता होती है क्योंकि वे तो अपने परिमाण से ही स्थूल रूप प्राप्त कर लेती हैं ;
ब्रह्मा द्वारा सृष्टि के सृजन के समय उन्होंने पहले पूर्ववत सृष्टि का चिंतन किया जिससे सर्वप्रथम तमोगुणी सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ ;इसमें तम, महाभोग,मोह ,तामिस्त्र और अंधतामिस्त्र ये पांच प्रकार की अविद्या उत्पन्न हुई ;दुबारा ध्यान करने पर ज्ञानशून्य ,बाहर भीतर से तमोमयी,,जड नगादि पांच प्रकार का सर्ग हुआ जिसे चौथा एवं मुख्य सर्ग कहा गया ; इस प्रकार आगे अज्ञानी विवेक रहित ,अनुचित मार्ग धारण करने वाला ,विपरीत ज्ञान को ही यथार्त मानने वाले और तिरछा चलने वाले तिर्यक सर्ग की उत्पत्ति हुई ; ये पांचवा सर्ग था ; छठा सर्ग उर्ध्व स्त्रोत अर्थात देवसर्ग हुआ ,ये विषय सुख के प्रेमी ,आंतरिक और बाह्य ज्ञान से पूर्ण थे ; सातवां सर्ग अर्वाक स्त्रोत हुआ , ये सत रज और तम तीनों गुणों को समाहित किये हुये थे ; महत्तत्व को पहला सर्ग ,तन्मात्राओं काू दूसरा सर्ग और तीसरा सर्ग वैकारिक कहा गया है ; आठवां सर्ग अनुग्रहसर्ग है ; प्रथम तीन सर्ग प्राकृत और बाद के पांच वैकारी सर्ग हैं ; एक और नवें सर्ग को कौमार सर्ग कहा गया जो प्राकृत भी है और वैकारी भी ;
सृष्टि की आयु के बारे में कहा गया है कि भगवान विष्णु के काल स्वरूप से इसकी गणना की जाती है ; देवताओं के बारह हजार वर्षों के सतयुग ,त्रेता ,द्वापर और कलियुग ये चार युग होते हैं ; इनका परिमाण क्रमशः 4,3,2 और 1हजार दिव्य वर्ष का होता है ; प्रत्येक युग से पहले उतने ही सौ वर्षों की संध्या और उसके बाद उतने ही सौ वर्षों के संध्यांश होते हैं ; चारों युगों का एक चतुर्युग और ऐसे 1 हजार चतुर्युग का ब्रह्मा का एक दिन होता है ; ब्रह्मा के एक दिन में 14 मनु अथवा मन्वन्तर होते हैं ; इस प्रकार 71 चतुर्युग और 5103 दिव्य वर्ष का एक मन्वन्तर होता है ; ये मनु अथवा देवताओं का काल है ; मानवी गणना से एक मन्वन्तर में 30 करोड 67 लाख 20 हजार वर्ष होते हैं ; इसका 14 गुना अर्थात 4 अरब 29 करोड 40 लाख 80 हजार वर्ष ब्रह्मा के एक दिन का मान है ; और यही इस सृष्टि की आयु है ; इसके अनन्तर बाह्य नैमिक्तिक नामक प्रलय होता है ;प्रलय के बाद इतने ही परिमाण वाली रात्रि होती है ; जिसके बाद ब्रह्मा पुनः सृष्टि की रचना में प्रवृत होते है ; अर्थात ब्रह्मा के एक ही दिन में सृष्टि की रचना और प्रलय हो जाता है ; इस प्रकार ब्रह्मा का भी 1 वर्ष और फिर 100 वर्ष पूरे होते हैं जो कि उनकी परमायु है ;
